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5th SEMESTER HINDI GE
CHAPTER 2 अनुवाद का स्वरूप और प्रकार
किसी भाषा में कही या लिखी गयी बात का किसी दूसरी भाषा में सार्थक परिवर्तन अनुवाद (Translation) कहलाता है। अनुवाद का कार्य बहुत पुराने समय से होता आया है।
अनुवाद का स्वरूप
अनुवाद के स्वरूप पर बात करते हुए उसे मूलतः दो संदर्भों में देखा गया है। व्यापक और सीमित । व्यापक संदर्भ में अनुवाद को प्रतीक सिद्धांत के रूप में देखा गया है। यानी अनुवाद मूलतः प्रतीकांतरण है। वहीं सीमित संदर्भ में अनुवाद को एक भाषिक क्रिया माना गया है जिसके अंतर्गत अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में अंतरण यानी भाषांतरण है।
अनुवाद का व्यापक स्वरूप
प्रतीक विज्ञान की मूलभूत इकाई प्रतीक है। पीयर्स के मतानुसार प्रतीक वह वस्तु है जो किसी के लिए किसी अन्य वस्तु के स्थान पर प्रयुक्त होती है। (A Sign.... is something that stands to some body for something else in some resepcet or capacity.) उदाहरण के लिए, यदि हम मेज पर विचार करते हैं तो मेज शब्द स्वयं मेज न होकर मेज का प्रतीक मात्र है जिसका चयन हमने उस वस्तु विशेष को पहचानने के लिए किया।
प्रतीक सिद्धांत के आधार पर रोमन जैकबसन ने भाषिक पाठ के अंतरण को तीन
आधारों पर देखने का प्रयास किया है।
· अंतःभाषिक अनुवाद (Intra lingual translation)
· अंतर्भाषिक अनुवाद (Inter lingual translation)
· अंतर- प्रतीकात्मक अनुवाद (Inter semiotic translation)
अंतःभाषिक (Make Changes in Same Lang): अनुवाद से तात्पर्य है एक भाषा की प्रतीक व्यवस्था में व्यक्त पाठ को उसी भाषा की अन्य प्रतीक व्यवस्था में रखना अथवा प्रस्तुत करना। इसे अन्वयांतर भी कहा जाता है। स्पष्ट है कि यहां दोनों प्रतीक व्यवस्थाएं एक ही भाषा से संबंधित होती है। संस्कृत में लिखी गई टीकाएं इसका उदाहरण है जहां जटिल संस्कृत में लिखे गए काव्य को सरल टीकाओं में व्यक्त किया गया है।
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अंतर्भाषिक अनुवाद (Change 1 Lang to other lang): एक भाषा के प्रतीकों में व्यक्त पाठ को दूसरी भाषा के प्रतीकों में अंतरण को अंतर्भाषिक अनुवाद कहते हैं। इसे भाषांतर भी कहा जाता है। स्पष्ट है कि अंतःभाषिक अनुवाद से अलग यह दो भाषाओं के अंतरण की क्रिया है। इस अनुवाद प्रकार में अनुवाद के लिए दो भाषाओं का ज्ञान होना अनिवार्य है। इसे ही अंग्रेजी में प्रॉपर ट्रांसलेशन कहा जाता है। वर्तमान समय में अंतर्भाषिक अनुवाद के विशेष मांग है। विश्व भर में सर्जनात्मक तथा ज्ञानात्मक साहित्य के प्रसार का आधार यही है। चूंकि इसमें दोनों भाषाओं की सक्रिय भूमिका होती है इसलिए इसका महत्व और बढ जाता है।
अंतर- प्रतीकात्मक अनुवाद (change The Medium): जहां अंतःभाषिक और अंतर्भाषिक अनुवाद में प्रतीक 2 का भाषिक इकाई होना अनिवार्य है वहीं अंतर- प्रतीकात्मक अनुवाद में प्रतीक 2 यानी लक्ष्य पाठ भाषिक न होकर भाषेतर होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसमें भाषिक पाठ का अनुवाद भाषेतर इकाई में होता है। उदाहरण के लिए किसी उपन्यास या कहानी का फिल्म, नाटक या धारावाहिक में रूपांतरण। यहां अंतरण भाषिक न होकर रूपगत होता है। शरतचंद्र, प्रेमचंद शेक्सपीयर, मन्नू भंडारी, रस्किन बॉण्ड, आदि की रचनाओं का फिल्म में रूपांतरण इसके उदाहरण है। प्रसिद्ध कविता का गीत में और गीत या कविता आदि का विज्ञापन के जिंगल में रूपांतरण भी अंतरप्रतीकात्मक अनुवाद के उदाहरण हैं।
अनुवाद का सीमित संदर्भ
अनुवाद का सीमित संदर्भ अनुवाद को केवल एक भाषिक क्रिया मानता है जिसके अंतर्गत स्रोत भाषा के पाठ का लक्ष्य भाषा में अंतरण किया जाता है। सीमित संदर्भ में अनुवाद के दो आयाम माने गए हैं।
· पाठधर्मी अनुवाद
· प्रभावधनी अनुवाद
पाठधर्मी अनुवाद से तात्पर्य है ऐसा अनुवाद जिसमें पाठ अर्थात स्रोत पाठ सर्वोपरि हो। ऐसे अनुवाद में अनुवादक से अपेक्षा की जाती है कि वह मूल पाठ के प्रति ईमानदार हो और अनुवाद करते समय मूल की आत्मा को बचाए रखने का सतत् प्रयास करे। अनुवादक को यहां अनुवाद प्रक्रिया में छूट लेने की सुविधा नहीं होती। अनुवादक यहां मूल पाठ के कथ्य और शिल्प दोनों के प्रति सचेत रहते हैं और उसे यथासंभव लक्ष्य भाषा में लाने का प्रयास करते हैं। कार्यालयी विधि तथा किसी भी प्रकार के ज्ञानात्मक साहित्य के लिए पाठधर्मी अनुवाद ही बेहतर माध्यम है।
पाठधर्मी आयाम के अंतर्गत अनुवाद में स्रोत-भाषा पाठ केंद्र में रहता है जो तकनीकी एवं सूचना प्रधान सामग्रियों पर लागू होता है।
प्रभावधर्मी अनुवाद जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है पाठ के प्रभाव को केन्द्र में रखकर चलता है स्रोत भाषा के पाठ लक्ष्य भाषा के पाठक एवं समाज पर भी वैसा ही असर पड़े इसके लिए आवश्यक है कि उसे लक्ष्यभाषा की प्रकृति के
अनुसार बनाया जाए। यह तभी संभव है जब अनुवादक अनुवाद करते समय उसमें यथासंभव छूट ले। इसके लिए अनुवादक का दोनों संस्कृतियों का ज्ञान एवं समझ होना अपरिहार्य है। साहित्य के अनुवाद में विशेषतः कविता के अनुवाद में प्रभावधर्मी अनुवाद किया जाता है।
प्रभावधर्मी अनुवाद में स्रोत भाषा पाठ की संरचना तथा बुनावट की अपेक्षा उस प्रभाव को पकड़ने की कोशिश की जाती है जो स्रोत-भाषा के पाठकों पर पड़ा है। इस प्रकार का अनुवाद सृजनात्मक साहित्य और विशेषकर कविता के अनुवाद में लागू होता है।
1. अनुवाद एक भाषा (स्रोत भाषा) में व्यक्त भावों और विचारों को दूसरी भाषा (लक्ष्य भाषा) में व्यक्त करना है।
2. अनुवाद में समान (निकटतम) अभिव्यक्ति की खोज की जाती है।
3. अनुवाद में ऐसी अभिव्यक्ति की आवश्यकता होती है जो स्रोत भाषा से प्रभावित न हो.
4. अनुवाद में मूल रचना के अर्थ के साथ-साथ शैली को भी सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है।
5. अनुवाद की न्यूनतम शर्त द्विभाषिकता है और इसका मूल तत्व सार्थक पुनरुक्ति है।
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अनुवाद के प्रकार
1. शब्दानुवाद(meaning doesn’t necessary)- स्रोत-भाषा के शब्द एवं क्रम को उसी प्रकार लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित करना शब्दानुवाद कहलाता है। यहाँ अनुवादक का लक्ष्य मूल-भाषा के विचारों को रूपान्तरित करने से अधिक शब्दों का यथावत् अनुवाद करने से होता है। शब्द एवं शब्द क्रम की प्रकृति हर भाषा में भिन्न होती है। अतः यांत्रिक ढंग से उनका यथावत् अनुवाद करते जाना काफ़ी कृत्रिम, दुर्बोध्य एवं निष्प्राण हो सकता है। शब्दानुवाद उच्च कोटि के अनुवाद की श्रेणी में नहीं आता।
उदाहरण के लिए अंग्रेजी का निम्नलिखित वाक्य देखें :
" The boy, who does not understand that his future depends on hard studies, is a fool."
यदि हिन्दी में इसका अनुवाद इस प्रकार किया जाता है-
"वह लड़का,जो यह नहीं समझता कि उसका भविष्य सख्त अध्ययन पर निर्भर करता है, मूर्ख है।" --> यह वाक्य विन्यास हिन्दी भाषा के वाक्य विन्यास के अनुरूप नहीं होगा, hard के लिए यहाँ 'सख्त' शब्द भी उपयुक्त समानार्थी नहीं लगता।
यदि उपर्युक्त अंग्रेजी वाक्य का अनुवाद इस प्रकार किया जाए :
"वह लड़का मूर्ख है जो यह नहीं समझता कि उसका भविष्य कठोर अध्ययन पर निर्भर है।" -- > तो अनुवाद का वाक्य-विन्यास हिन्दी भाषा की प्रकृति के अनुरूप होगा और इसी में अनुवाद की सार्थकता निहित है।
इसी प्रकार, हिन्दी की प्रकृति के प्रतिकूल और अनुकूल कुछ अनुवाद देखिए-
अंग्रेजी : "I will not go", he said.
हिन्दी की प्रकृति के प्रतिकूल अनुवाद : "मैं नहीं जाऊँगा", उसने कहा।
हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल अनुवाद : "उसने कहा कि मैं नहीं जाऊँगा।"
Sita Shed crocodile tear
सीता बहाए मगरमच्छ के आंसू
(सीता ने मगरमच्छ के आंसू बहाए)
2.भावानुवाद(translate with same meaning)- साहित्यिक कृतियों के संदर्भ में भावानुवाद का विशेष महत्व होता है। इस प्रकार के अनुवाद में मूल-भाषा के भावों, विचारों एवं सन्देशों को- लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित किया जाता है। इस सन्दर्भ में भोलानाथ तिवारी का कहना है : ‘मूल सामग्री यदि सूक्ष्म भावों वाली है तो उसका भावानुवाद करते हैं।’ भावानुवाद में सम्प्रेषणीयता सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसमें अनुवादक का लक्ष्य स्रोत-भाषा में अभिव्यक्त भावों, विचारों एवं अर्थों का लक्ष्य- भाषा में अन्तरण करना होता है। संस्कृत साहित्य में लिखे गए कुछ ललित निबन्धों के हिन्दी अनुवाद बहुत ही सफल सिद्ध हुए हैं।
3.छायानुवाद Free Translate (make changes in content but meaning should same) - अनुवाद सिद्धान्त में छाया शब्द का प्रयोग अति प्राचीन है। इसमें मूल-पाठ की अर्थ छाया को ग्रहण कर अनुवाद किया जाता है। छायानुवाद में शब्दों, भावों तथा संकल्पनाओं के संकलित प्रभाव को लक्ष्य-भाषा में रूपान्तरित किया जाता है। संस्कृत में लिखे गए भास के नाटक ‘स्वप्नवासवदत्तम्’ एवं कालिदास के नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के हिन्दी अनुवाद इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
4.सारानुवाद(translate main meaning, and content meaning should same)- सारानुवाद का अर्थ होता है किसी भी विस्तृत विचार अथवा सामग्री का संक्षेप में अनुवाद प्रस्तुत करना। लम्बी रचनाओं, राजनैतिक भाषणों, प्रतिवेदनौं आदि व्यावहारिक कार्य के अनुवाद के लिए सारानुवाद काफ़ी उपयोगी सिद्ध होता है। इस प्रकार के अनुवाद में मूल-भाषा के कथ्य को सुरक्षित रखते हुए लक्ष्य-भाषा में उसका रूपान्तरण कर दिया जाता है। सारानुवाद का प्रयोग मुख्यतः दुभाषिए, समाचार पत्रों एवं दूरदर्शन के संवाददाता तथा संसद एवं विधान मण्डलों के रिकार्डकर्ता करते हैं।
अनुवाद की विशेषता:
अनुवाद का अर्थ है एक भाषा को सजीव सा के साथ दूसरी भाषा में उतारना| यह अनुवाद सफल तभी कहलाएगा जब अनुवादक अनुवाद के गुणों से परिचित हो। अनुवादक ही अनुवाद की हर विशेषता और गुणवत्ता के लिए उत्तरदाई है|
दोनों भाषाओं का अधिकार- यह अनुवादक की सबसे बड़ी विशेषता है| जब तक अनुवाद को स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दोनों का अच्छा ज्ञान नहीं होगा वह बेहतर अनुवाद नहीं कर सकता| अनुवादक को मातृभाषा के अतिरिक्त अनुवाद करने वाली भाषा पर जबरदस्त अधिकार होना चाहिए| उसे दोनों भाषाओं स्वर और ताल का ही नहीं बल्कि मुहावरों और लोक कहानियां का भी ज्ञान होना चाहिए।
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विषय का पूर्ण ज्ञान: अनुवादक केवल दोनों भाषाओं पर अधिकार के बाद ही अनुवाद नहीं कर सकता अगर उसे विषय की अच्छी जानकारी ना हो| उदाहरण के तौर पर अगर किसी वैज्ञानिक से साहित्य का अनुवाद कराया जाए तो चाहे वह उसका अनुवाद तो कर देगा परंतु अनुवाद निर्जीव होगा| अनुवाद में संवेदनशीलता का तत्व नहीं होगा| अनुवादक को विषय की जानकारी होना एक अनिवार्य है|
समतुल्यता : वस्तुतः अनुवाद एक द्विभाषिक प्रक्रिया • विभिन्न भाषाओं की प्रकृति और प्रवृत्ति एक-दूसरे से भिन्न होती है, अतएव अनुवाद की सफलता एवं सार्थकता के लिए उन दोनों भाषाओं के बीच विभिन्न स्तरी पर समतुल्यता आवश्यक है। इसी कारण दोनों भाषाओं स्रोत भाषा (Source Language) तथा लक्ष्य भाषा (Target Language) का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
देश काल और वातावरण से परिचित: अनुवादक को जिस रचना का अनुवाद करना है उस रचना के देश काल और वातावरण से पूरी तरह परिचित होना चाहिए| अगर अनुवादक ऐसा नहीं करेगा तो उसे एक अच्छे अनुवाद करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा| असल में अनुवादक और अनुवाद की जाने वाली रचना ने सांस्कृतिक अंतर देखने को मिल सकता है जिससे गलतियां करने की संभावना बढ़ जाती है। किसी गलती से बचने के लिए अनुवादक को दोनों रचनाओं की देशकाल और वातावरण से परिचित होना आवश्यक है|
अनुवाद के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं-
(1) बोल बाल का क्षेत्र – वैसे भी बातचीत में जब हम अपनी मातृभाषा से भिन्न भाषा में बोलते हैं, तब हम खुद अनजाने अनुवाद करते रहते हैं। हम पहले मातृभाषा में सोचते हैं, फिर उसके मन में ही अन्य भाषा में अनुदित करते हैं। यहीं अनुदित रूप हमारे मुँह से निकलता है। यही कारण है कि हम कोई भी अन्य भाषा बोलें, उस पर हमारी मातृभाषा का कुछ-न-कुछ प्रभाव नजर आता है। औसत भारतीय की अंग्रेजी भी इसका अपवाद नहीं है।
पत्राचार का क्षेत्र – बातचीत के क्षेत्र के बाद पत्राचार का क्षेत्र अनुवाद् माँगता है। पत्राचार व्यापार में, कार्यालय में न्यायालय में सर्वत्र होता है। जहाँ पत्राचार अपने प्रदेश की भाषा में करने से काम चलता है वहाँ अनुवाद की जरूरत नहीं पड़ती। किन्तु एक ही प्रदेश में कई भाषाएँ बोलने वाले पीढ़ियों से रहते हैं। उनके लिए प्रादेशिक भाषा भी परायी रहती है। जैसे—केरल में तमिल भाषी और कन्नड़-भाषी काफी संख्या में हैं। उनके लिए केरल की प्रादेशिक भाषा मलयालम का पत्राचार अनुवाद को आवश्यक बना देता है। जो व्यापारी बड़ी कंपनियों से माल मँगाते या उन्हें माल बेचते हैं उन्हें उन कंपनियों से पत्राचार कम्पनी की भाषा से करना पड़ता है। विदेशी कम्पनियाँ अपने देश की भाषा में पत्राचार करती हैं। ऐसी हालत में व्यापारियों को अंग्रेजी के अलावा जर्मन, जापानी आदि भाषाओं में भी लिखा-पढ़ी करनी पड़ती है। इसके लिए अनुवाद के सिवा कोई उपाय नहीं है।
कार्यालयों में – हमारे देश के अधिकांश कार्यालयों की भाषा अंग्रेजी है। मुश्किल से पंचायत व गाँवों के स्तर पर प्रादेशिक भाषा का व्यवहार किया जाता है। आम लोगों को अपनी अर्जियाँ तक अंग्रेजी में लिखनी पड़ती हैं। यहाँ से अनुवाद की प्रक्रिया शुरू होती है। पुलिस, मजिस्ट्रेट जैसे अधिकारियों के कार्यालयों में अनुवाद का जोर रहता है। देवस्वम, रजिस्ट्रेशन जैसे विभागों के निचले स्तर पर प्रादेशिक भाषा काम देती है और ऊपरी स्तर पर अंग्रेजी । चर्चित विषय प्रांत का रहता है। इसलिए अनुवाद का प्रसंग बराबर उठता है।
शिक्षा के क्षेत्र – में शिक्षा का क्षेत्र अनुवाद के बिना आगे नहीं बढ़ पाता। आधुनिक युग में विज्ञान, समाज-विज्ञान, अर्थशास्त्र, गणित आदि बीसियों विषय सीखे और सिखाये जाते हैं। इनके उत्तम ग्रंथ अंग्रेजी ही नहीं, अन्य विदेशी भाषाओं में भी लिखे हुए हैं। इनका अनुवाद किये बिना ज्ञान की वृद्धि नहीं हो पाती। भारतीय भाषाओं को अध्ययन का माध्यम बनाने के बाद इसकी अनिवार्यता बढ़ी है।
यह अनुवाद भारत में ही हो, सो बात नहीं। जिन अंग्रेजों या रूसियों को भारतीय साहित्य का ज्ञान पाना हैं उन्हें भारतीय साहित्य का अनुवाद अंग्रेजी या रूसी में प्राप्त करना पड़ता है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के गहन अनुसंधान के क्षेत्र में तो सारा लेखन कार्य उन्हीं भाषाओं में किया जाता है। इसीलिए इनके छात्र विदेशी भाषा सीखने को मजबूर होते हैं। वे विदेशी भाषा की सामग्री अपनी परिचित भाषा में अनुदित कर लेते हैं।
संचार माध्यम में संचार के माध्यमों में अनुवाद का प्रयोग अनिवार्य होता है। इनमें मुख्य हैं समाचार-पत्र, रेडियो एवं दूरदर्शन। ये अत्यन्त लोकप्रिय हैं और हर भाषा में इनका प्रचार बढ़ रहा है। प्रादेशिक भाषाओं में समाचार पत्र समाचारों के लिए सरकारी सूचना, न्यूज एजेंसियों की दी हुई सामग्री, प्रादेशिक संवाददाताओं की डाक आदि पर निर्भर करते हैं। इनमें प्रादेशिक भाषाओं में सीमित सामग्री ही प्राप्त होती है।
साहित्य के क्षेत्र में साहित्य अनुवाद के लिए सबसे उर्वर क्षेत्र प्रमाणित हो चुका है। प्रतिभा देश व भाषा की दीवार नहीं मानती, किन्तु अनुवाद के जरिए ही हम अन्य भाषा की प्रतिभाओं को पहचान सकते हैं। प्राचीन भाषाओं के बाङ्मय को आधुनिक युग के पाठक अनुवाद के सहारे ही समझ पाते हैं। हमारे ही देश में कुछ शताब्दियों पहले तक संस्कृत साहित्य खूब पढ़ा जाता था और बहुत लोग संस्कृत जानते थे। अब आधुनिक युग की भाषाओं का जोर है और संस्कृत जानने वाले कम। इसलिए अनुवाद से ही हम संस्कृत की सरसता ग्रहण करते हैं। एक सीमित क्षेत्र की भाषा में लिखे हुए उत्तम साहित्य ग्रन्थ संसार के व्यापक क्षेत्रों की भाषाओं में जब अनुदित होते हैं तब उनका प्रचार व उनके लेखकों का सम्मान बढ़ता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के बंगला छन्द अगर अंग्रेजी में अनुदित करके प्रकाशित न किए जाते तो उन्हें नोबेल पुरस्कार शायद ही मिलता। नोबेल पुरस्कार अव ऐसी भाषाओं की रचनाओं को भी सम्भव हो सका है जो अत्यन्त सीमित प्रदेश में व्यवहृत होती है।
अनुवाद का महत्व
- शिक्षा और अनुवाद
शिक्षा के क्षेत्र में अनुवाद का अत्यधिक महत्व है। विश्वभर में उपलब्ध ज्ञान औरशोध को शिक्षार्थियों तक पहुँचाना आज बेहद आवश्यक है। अनुवाद के माध्यम से ही शिक्षार्थियों को नवीनतम जानकारी उपलब्ध करवाई जा सकती है। विद्यालयों में भारतीय भाषाओं के साथ- साथ अंग्रेजी एवं विश्व की अनेक भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं। इन भाषाओं के ज्ञान से बच्चे न केवल ज्ञान की दृष्टि से समृद्ध हो रहे है, अपितु वे व्यापक स्तर पर विश्व नागरिक भी बन रहे हैं उनके लिए शिक्षा केवल उनके क्षेत्र अथवा राष्ट्र तक सीमित नहीं है अपितु वे ज्ञान- विज्ञान के विभिन्न अनुभवों से भी परिचित हो पा रहे हैं।
- पर्यटन और अनुवाद
पिछले कुछ दशकों में पर्यटन एक बड़े व्यवसाय के रूप में उभरा है। दुनिया भर से जिज्ञासु लोग विभिन्न देशों एवं उनकी संस्कृतियों को जानने के लिए भ्रमण करते हैं। पर्यटन के क्षेत्र में इस हलचल के चलते अनुवाद का महत्व और अधिक बढ़ गया है। विभिन्न पर्यटन स्थलों के विषय में जानकारी लगभग सभी महत्वपूर्ण भाषाओं में उपलब्ध है। सूचना पटूट, ब्रोशर्स, पंफलेट, मार्गदर्शिका आदि आज विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध होती है जिनकी सहायता से विभिन्न भाषा-भाषी पर्यटक अपनी मूल भाषा अथवा अंग्रेजी आदि में सूचना प्राप्त कर सकते हैं।
- जनसंचार माध्यमों में अनुवाद
जनसंचार का लगभग पूरा व्यवसाय अनुवाद पर केंद्रित है। 24 घंटे समाचार प्रस्तुत की मांग और समाचार-पत्रों के प्रकाशन के चलते यहां व्यापक स्तर पर अनुवाद कार्य होता है। पत्रकारिता, मुख्यधारा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक समाचारों और जानकारियों की मांग के चलते जनसंचार के क्षेत्र में अनुवाद और अनुवादकों की मांग अनवरत बनी रहती है। दुनिया भर से आ रही सूचनाओं को देश के गांव, शहर और कस्बों तक पहुँचाने की चुनौती ने मीडिया के क्षेत्र में अपार संभावनाएं पैदा की हैं। आज जनसंघार माध्यम सर्वाधिक मांग में है। गीत से लेकर, विज्ञापन, वृत्तचित्र, फिल्में, समाचार आदि सभी क्षेत्रों में अद्यतन सूचना प्रदान करने तथा बाजार के तय लक्ष्यों को हासिल करने में अनुवाद सक्रिय भूमिका अदा कर रहा है।
अनुवाद की प्रकृति
किसी भी कार्य को उसके स्वरूप और प्रकृति के आधार दो रूपों देखा जाता है- विज्ञान और कला। इसके लिए उस क्षेत्र में किए जाने वाले कार्यों के स्वरूप, उसके लिए स्थापित नियमों के स्वरूप वा स्थिति आदि को आधार बनाया जाया है। व्यावहारिक कार्यों से जुड़े शास्त्रों की प्रकृति के संबंध में सदैव यह प्रश्न उठता रहा है कि वह विज्ञान है या कला। इस संदर्भ में अनुवाद को स्थिति को इस प्रकार से देख सकते हैं-
कला के रूप में अनुवाद
कला वह है जिसमें सर्जक किसी रचना का इस प्रकार निर्माण करता है कि उसमें उसकी कल्पना, सहजता, स्वाभाविकता और भावनाओं की झलक मिलती है। इसी कारण कला को व्यक्तिनिष्ठ माना गया है। कोई कलाकृति कैसी होगी, यह कलाकार पर निर्भर करता है। इस दृष्टि से अनुवाद को देखा जाए तो हम पाते हैं कि अनुवाद किसी एक भाषा में कही गई बातों का शब्दशः रूपांतरण नहीं है, बल्कि कई बार उसमें अनुवादक को लक्ष्य भाषा के पाठकों को ध्यान में रखते हुए पुनसृजन करना पड़ता है। अनुवाद एक भाषा की सामग्री का दूसरी भाषा की सामग्री में शब्दशः या वाक्यशः रूपांतरण नहीं है। अनुवादक को लक्ष्य भाषा की प्रकृति और यदि अनुवाद किसी साहित्यिक या सामान्य रचना का किया जा रहा है तो लेखक की प्रकृति का ध्यान रखना होता है।
अनुवाद करते समय अनुवादक का पूरा बल इस बात पर होता है कि लक्ष्य भाषा के पाठक को अनूदित कृति पढ़ते समय स्रोत भाषा के पाठक की तरह ही अनुभूति हो। इसके लिए कई बार अनुवादक को अपनी कल्पना, सहजता, सृजनात्मक शक्ति आदि का प्रयोग करना पड़ता है। इसी कारण कहा गया है कि अनुवाद मूल कृति की आत्मा को अनूदित कृति में उतारने की कला है।
विज्ञान के रूप में अनुवाद
वह शास्त्र जिसमें अध्येय सामग्री का वस्तुनिष्ठ, क्रमबद्ध और सुसंगठित अध्ययन किया जाता है, विज्ञान है। विज्ञान कोई विषय नहीं है, बल्कि अध्ययन की एक पद्धति है, जिसमें शोधकर्ता की भावनाएँ, सृजनात्मकता, सहजता कोई मायने नहीं रखती, बल्कि लक्ष्य वस्तु नियमों और सिद्धांतों के अनुसार जैसी जान पड़ती है, उसे वैसे ही प्रस्तुत करना होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो अनुवाद में सर्वमान्य सिद्धांत होते हैं। प्रत्येक अनुवादक को अनुवाद करते समय किसी-न-किसी रूप में उनका ध्यान रखना होता है। इसी कारण कुछ विद्वानों द्वारा अनुवाद को अन्य विज्ञानों की तरह विज्ञान माना गया है। कार्यालयी और तकनीकी क्षेत्रों से संबंधित सामग्री का अनुवाद करते समय अनुवादक को तटस्थ रहना पड़ता है और स्रोत भाषा में कोई बात जिस प्रकार कही गई रहती है, उसे लक्ष्य भाषा में वैसे ही रखना पड़ता है।
अनुवाद : एक वैज्ञानिक कला
अनुवादकों और अन्य चिंतकों द्वारा अनुवाद की प्रकृति पर गहन चिंतन किया गया है और यह प्राप्त हुआ है कि न तो विशुद्ध रूप से यह कहा जा सकता है कि अनुवाद एक कला है और न ही यह कहा जा सकता है कि अन्य विज्ञानों की तरह अनुवाद एक शुद्ध ‘विज्ञान’ है। इसमें दोनों का मिश्रण प्राप्त होता है। इसलिए अनुवाद के संदर्भ में यही कहना उत्तम होगा कि अनुवाद एक वैज्ञानिक कला है।
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